यादों की एक सड़क


Vikas Posted: February 15 ,2014

मैं अब भी कभी कभी हक़ीक़त से थोड़ा सा वक़्त चुरा कर

अपने ख़यालों में उस आधी टूटी सड़क की सैर कर आता हू

जिसके किनारे मुस्तैदी से खड़े पेड़ों पर लगे फूलों की ख़ुशबू आज भी उतनी ही ताज़ी है

जितनी उन दिनों हुआ करती थी 


सड़क के एक तरफ बच्चों के खेलने का एक पार्क था 

जिसके एक कोने में छोटा सा मंदिर था 

जहाँ उसे अक्सर सुबह सुबह चंद दुआयें लिए जाते देखा था मैंने 

उसके घर के पास एक पुराना दरख़्त हुआ करता था 

जो कुछ ख़ामोश और मुख़्तसर मुलाक़ातों की गवाही देता था 


पता नहीं वो दरख़्त अब वहाँ है या नहीं 

कौन जाने, उम्र के दायरों का शिकार बन चुका हो

जाड़ों की आलसी दोपहरों में उस दरख़्त के सब्ज़ पत्तों से छन कर 

धूप नीचे मोज़ैक के बिस्तर पर आराम करने आती थी 

और शाम होते होते रोशनी के वो धुंधले पड़ते टुकड़े 

परछाइयों का हिस्सा बन जाया करते थे 


सुना है अब वो वहाँ नहीं रहती 

वो शहर छोड़ दिया है उसने 

आज जब एक अरसे के बाद मेरा उस शहर जाना हुआ

तो कदम खुद-ब-खुद उस रास्ते की तरफ बढ़ चले 

और आँखों ने एक मायूस हसरत के साथ उसे तलाश करना शुरू कर दिया 

जो अब शायद वहाँ कभी दिखाई न दे...





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