माँ! मुझे बचा लो


Meena Sood Posted: December 18 ,2014

माँ! मुझे बचा लो.… 
माँ! मुझे बचा लो.… 
यही करुण पुकार निकली होगी 
हर उस सहमते, सिसकते, 
कराहते,भयभीत हृदय से,
देखा होगा जिसने 
मृत्यु के दानव का 
वीभत्स मानव रूप, 
और 
और भींच ली होंगी अपनी मुट्ठियाँ 
देख के उस दानव का ताण्डव,
कर ली होंगी अपनी आँखें बंद 
मानों आँखें मीचते ही जैसे दिखता नहीं कुछ 
वैसे ही होगा भी नहीं कुछ

दहशत के साये ने घेरा होगा ऐसे 
कि एकबारगी डर लगा होगा
अपने साये से भी
चीखें ऐसे चीर रही होंगी 
मानों पिघला सीसा उंडेल दे कोई कानों में

हर तरफ़ दर्द का ताण्डव 
हर तरफ़ सिसकियों की सहमी सी आवाज़ें 
जो अंदर ही घुट कर रह जाना चाहती थीं 
ताकि कोई लाश समझ कर छोड़ दे

हर सिसकी ने यही पुकारा होगा 
माँ! मुझे बचा लो… 
माँ! मुझे बचा लो…………

छुपा लो मुझे अपनी गोद में 
जहां मुझे कोई डर नहीं सताता 
उसी आँचल की शीतल छाया तले 
जहां मुझे कभी कोई नहीं रुलाता

माँ! 
माँ! रक्त के बहाव की तीव्रता 
और उसके ताप को 
मैंने पहले भी महसूस किया था 
जब अव्वल आया था किसी परीक्षा में, 
पर ये लहू 
जो मेरे पैरों के नीचे बह रहा है 
सड़ांध है इसमें हैवानियत की

क्या इंसान ऐसा भी होता है माँ
कि इंसानियत भी शरमा जाये ?
इससे अच्छा तो वो शैतान था माँ
जो तेरी कहानियों में आता था 
इस वहशी इंसान की कहानी तो तूने मुझे 
कभी सुनाई ही नहीं

माँ!
रोज़ आती थी तू मुझे स्कूल से लेने 
और कभी घर बैठ 
रस्ता तका करती थी मेरा 
मुझे देखते ही लपक कर 
मेरे हाथ से मेरा बस्ता ले लेती थी तू 
और हल्का कर देती थी 
मेरे कन्धों का बोझ

पर माँ!
आज कौन हल्का करेगा
तेरे मन का ये बोझ?
तेरे मन की कराहना 
तेरा ये रोष ?

इतना वजनी तो 
कभी नहीं लगा होगा तुझे,
मुझे और मेरे बस्ते को उठाना 
ज़रूर सोचती होगी तू 
कि क्यूँ बजा था अलार्म उस दिन 
और भेजा था मुझे स्कूल 
व्यथित करती होंगी सब झांझ, घंटियाँ 
नहीं सुनाई देती होगी अब तुझे अजान 
किसने पढ़ाया ये पाठ उन्हें माँ
ऐसा तो नहीं कहता कोई क़ुरान 
ऐसा तो नहीं कहता कोई क़ुरान!!!





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