Writing Contest - No 3


Payal Agarwal Posted: October 23 ,2014

~ मेरी दिवाली होगी जब ~ 

सुबह की किरणें जब रोशन करे इस जहाँ को 
शनै:-शनै: कर भर लूँ हर्ष के अपने डेग में वो 

घूँट-घूँट पिलाऊँ मैं हर रोज उसमें से प्याली में 
बांटूँ वक्त कुछ साथ उनके रोते हैं जो अकेले में 

सुबकती हुई भूख को जो दे सकूं कुछ सुकून मैं 
दो-चार निवाले हाथों से खिला के अपने थाल से 

पल-पल तकती अँखियाँ अपनों की कोई आहट हो 
दहलीज़ पे बैठ उनके मलहम लगा दूँ जख्मों को 

काँपती बूढ़ी हड्डियों को हाथ बढ़ा कभी थाम लूँ 
सिले हुए होठों पे उनके कोई नज़्म मीठी ला सकूँ 

मायूस वो मासूम जो न जाने मुस्कान क्या होती 
नियति से लड़ थोड़ा हँसी उनकी छीन लौटा पाती 

जगमग हो महल तो हर चौखट भी एक दीप जले 
बाह्य रौशनी से पहले अंतस मन को स्वच्छ करें 

सजदा है प्रभु कि इसी जहाँ में जन्नत को दे दर्शा 
हर तड़पती रूह पे बस अपनी रहमत तू दे बरसा 

यही है ख़ुशी मेरी जिसे मांगू हूँ बारम्बार ऐ खुदा 
ऐसी रोशनाई तू दे बख्श कि लिखा सच हो जरा 

न हो कालिमा कोई दुःख-दर्द-द्वेष-दरिद्रता की 
हर मन उजियाला, स्नेह-सिक्त, प्रीत-दीप्त ही 

बस यही चाहना कि हो उजियारा चहुँ और ऐसा 
होगी दिवाली जो आलोकित हो हर पल कुछ ऐसा 

है दिवाली बस उसी लम्हा.... !

~ पायल ~ 





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