गुज़रता वक़्त


Vikas Posted: March 09 ,2014

जिस बेंच पर हमने कभी साथ बैठ कर

अक्सर सूरज की पलकों को बोझिल होते देखा था 

और कई शामों को रात से दबे पाँव मिलते पाया था

आज वो बेंच जर्जर सी दिखाई देने लगी है

 

वो लैंप-पोस्ट जो हर रात अंधेरे में एक दिलासे की तरह जलता था

उसकी रोशनी भी अब मद्धम पड़ने लगी है

जब तब यूँ भी लगा की वो अब मुझे नहीं पहचानता

शायद बूढ़ा हो चला है

सच ही कहा है किसी ने

वक़्त की संगदिली बहुत इंसाफ़-पसंद है

किसी को नही बख्शती

 

कितना कुछ बदल गया तब से अब तक

न जाने कब ताज़ी हवा को सरहदों की ज़रूरत पड़ गयी

और पार्क के चारो तरफ एक बाउंड्री वॉल बन गयी

अब एंट्रेन्स पर एक बड़ा सा गाते लग गया है

और पार्क के बीच-ओ-बीच एक फ़व्वारा भी बन गया है

जो दुनिया की हर फ़िक्र से बेख़बर हो कर

अपनी ही किसी धुन में झूमता रहता है दिन भर

 

अब भी जाता रहता हूँ उस पार्क में कभी कभी

उसी बुज़ुर्ग लैंप-पोस्ट के नीचे

उसी जर्जर होती बेंच पर बैठ कर

शाम को स्याह आगोश में छिपते हुए देखने

उन्ही गुज़रे हुए दिनों की तरह

 

लेकिन अब वो पहले सी तसल्ली नही रही

और वो पहला सा इत्मिनान नही रहा

अब शामों का सुनहरापन फ़ीका लगता है

अब रात की स्याही और गहराई सी लगती है

और अब लैंप-पोस्ट की रोशनी पहले जैसा दिलासा नहीं दे पाती

वो खाली बेंच मुझसे जब-तब तुम्हारे बारे में पूछा करती है

 

एक फ़र्क और आया है

उस बूढ़े होते लैंप-पोस्ट की मद्धम रोशनी में

मेरी परछाईं का सर पार्क की बाउंड्री वॉल से टकराने लगा है

 

गुज़रते वक़्त के साथ सब कुछ बदलता रहा

बस एक बेमानी सा इंतज़ार ही था जो बाकी रहा

जिस पर वक़्त की हर ज़्यादती बे-असर साबित हुई

एक इंतज़ार जो वक़्त के साथ और जवान होता रहा

एक इंतज़ार जो अब भी एक नादान सी उम्मीद देता है

और हर हक़ीक़त को भूल कर

मुझसे आज भी कहता है

तुम बस आते ही होगे





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