एक ख़्वाब


Vikas Posted: May 11 ,2014

एक ख़्वाब तराशा है मैंने बस अभी अभी
एक ख़्वाब कि जिसमें रेत के एक टीले पर बैठे हम दोनों
ख़ामोशी की चादर ओढ़े
और हाथों में हाथ लिए
दूर उफ़क़ पर डूब रहे सूरज को देखे जाते हैं

हवा के झोंके धुले हुए हैं ढलती शाम की ख़ुशबू से
रेत के कुछ आवारा ज़र्रे
हम दोनों की ख़ामोशी को कान लगाए सुनते हैं
दूर तलक बिखरी तन्हाई
और शाम की वरक़ सुनहरी
इस वस्ल-ए-रूहानी को क्या ख़ूब मुकम्मल करते हैं

तुम भी चुप हो, मैं भी चुप हूँ
और चुप चुप ही हम दोनों दिल भर के बातें करते हैं
ख़ामोशी की इस महफ़िल में लफ़्ज़ों को फ़ुर्सत है आज
ख़ामोशी की इस महफ़िल में 
केवल, ख़ामोशी ही कहती है
और ख़ामोशी ही सुनती है

मैं बस इस कोशिश में हूँ 
कि वक़्त के थान से किसी तरह ये पल उधेड़ लूँ
ये ढलती शाम यहीं रुक जाए
और आँख खुले तो तुमको पहलू में ही पाऊँ

एक तमन्ना के पुर्ज़े पर फ़िर से यूँ ही
एक "काश" उकेरा है मैंने बस अभी अभी
बस, कुछ ऐसा ही एक ख़्वाब तराशा है मैंने बस अभी अभी...





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