ख़ामोश ख़त


Vikas Posted: February 28 ,2014

एक ख़ामोश कहानी लिखता हूँ

सूख चली स्याही से कोरे क़ाग़ज़ पर

सफ़हे-दर-सफ़हे बस मैं कुछ ख़्वाब उकेरे जाता हूँ


क़ाग़ज़ भी बिखरे लफ़्ज़ों को पा कर ख़ुश है

सोच रहा है कब से तन्हा बैठा था मैं

कोई तो है अब जिससे फ़ुर्सत बाँट सकूँगा

बेमर्ज़ी क़ाग़ज़ के उपर 


घिसट घिसट कर सूख चली एक अफ़सुर्दा नुक

कोशिश में हैं गढ़े फ़साना तेरा मेरा

और पा जाए ये क़िस्सा अंजाम कोई





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