लौट आ


Vikas Posted: February 23 ,2014

ग़ुज़ारिश एक होठों पर रुकी है अनकही बन कर
चला लौट कर तू ज़िंदगी में ज़िंदगी बन कर

शमा बुझने लगी है, है धुआँ उठने लगा लौ से
तेरी मौजूदगी काश रहती रोशनी बन कर

समझ बैठा तू ख़ामोशी को मेरी बेरुख़ी शायद
नज़र आती है अक्सर बेबसी नाराज़गी बन कर

तेरे रहते मेरा एक ख़ास ही रिश्ता था ख़्वाबों से
हक़ीक़त इन दिनों मिलती है मुझसे अजनबी बन कर

कुछ भी था तेरे पहले तेरे बाद कुछ होगा
रहेगी आरज़ू पहली, तमन्ना आख़िरी बन कर





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