समाजसेवी


Mukesh Beniwal Posted: February 07 ,2014

मामूली वक्त में 
अंधाधुंध ,गैरकानूनी ढंग से
लुट कर हमें

पहन समाजसेवी का चौला

समाजसेवी 
बनते रातों रात लाखों  चहरे ...
थमा देते हैं
कुछ रंगीन कागज़ 
बेबस ,बेसहारा तस्वीरों के हाथों में
उठा ले लेते हैं

ठेका समाज 
संवारने का ....
ना जुबान सही ,ना नजरें  

झूठी मुस्कान

मन ओर दिमाग ,दिल पे भारी


वो भी वाकिफ है 
रंगीन कागज़ों के दम पर 

समाज ना संवरते

दिलों को जीतना ना आये

तो क्या हुआ

दिलों को खरीदना तो जानते हैं

जिद्द तो देखो इनकी ...

जिन्होंने कई पीढियाँ 
सौंप दी समाज को ...
लोहा कूटकर ,लकड़ी सँवार  कर 
हल जोत कर ,बाल सँवार  कर 
झाड़ु लगा कर , कपड़ा बुनकर
पत्थर सँवार कर

लेकिन चौलाधारी समाजसेवी

आज इन पर भारी हैं ...................मुकेश बेनीवाल





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