टिटूड़ी


Mukesh Beniwal Posted: February 07 ,2014

तपती रेत में …

दुर-दुर तक ना छाँव ,

ना पानी चढता सुरज …

एक सूखे पेड़ के तने के सहारे

घास- फूस की गोल आकृति में…

तीन सफेद अण्डे …

पेड़ की एक टहनी पर पहरा टिटूड़ी का…

टकटकी आकृति पर साधे हुये …

इंतजार जैसे होता है सूखे तालाब को

बरसात का

उसे इंतजार बस कठोर परत हटने का …

सोयी नही वो अनमोल रातों में

नींद झलक रही है उसकी आँखों में

वो उसका घर था

मैं राही उस रास्ते का ओर बढ आया मैं …

अपने घर की ओर …

फिर जाना हुआ उसी रास्ते से …

ले गया अपने घर से अनाज और पानी

आज शान्त ना थी वो

पतंग की तरह गोते लगा रही थी

चक्कर पेड़ के चारों ओर…

लगा कुछ तो घटा है …

अनहोनी शायद

जुटा कर साहस पास पहुँचा

देख कर सतब्ध रह गया …

एक फूटा हुआ …एक गायब … तीसरे पर खरोंचें …

अब वो मेरे सिर पर मंडराने लगी चिल्लाकर जोर-जोर से

अब टिटूड़ी मंडराये भी क्यों ना

घटा भी उसके साथ कुछ ऐसा ही …

कहाँ गलत वो बेचारी मैंने तो जिद्द ना की …

हट गया चुग्गा रख कर

कुछ घटा चुका था उसके साथ

शायद पहले भी ऐसा ही वाकया

तभी तो यहाँ आयी थी शायद

वो भी जानती थी बाग-बगीचों का रास्ता

यहाँ भी आ गये …

तपस्या भंग करने …

कुछ दिन बाद जाना हुआ …

पेड़ के नीचे नजरों को कुछ ना दिखा बिखर सा गया मैं …

कहाँ गये दोनों ,कैसे होगें ,

अब दिल तो यही बोला जहाँ भी रहे खुश रहे …

एक आवाज आयी कहीं से

चौंका गयी मुझे

ऊपर देखा एक टहनी पर

चुजे को कुछ खिला रही थी …

वो अपनी चोंच से

कुछ पल मेरी ओर देख दोनों उड़ गये …

देखता रहा ………

आज तक ना आये वापस ……………… मुकेश बेनीवाल





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