शायद


Vikas Posted: March 27 ,2014

अधूरा सा नज़र आने लगा है ये जहाँ शायद

ज़मीं ने खो दिया है आज अपना आसमाँ शायद

 

न घर मेरा, न दर मेरा, न ये सामान मेरा है

कि रुख्सत हो गया वो ले के मेरा आशियाँ शायद

 

यूँ ही तन्हाई में अक्सर लगे कि सामने है वो

उसे भी हो रहा होगा कोई ऐसा गुमाँ शायद

 

निशाँ कुछ जाने पहचाने से कदमों के मिले मुझको

यहाँ से हो के गुज़रा होगा उसका कारवाँ शायद

 

सीने में जवाँ है अब भी एक उम्मीद बेमानी

कहीं दिख जाए सेहरा में कोई आब-ए-रवाँ शायद

 

बड़ी मुद्दत से कश्ती ने कोई साहिल नहीं देखा

मेरे दिल का समंदर हो चला है बेकराँ शायद

 

सहते जा रहे दर्द सारे खुद को समझा कर

कि होते होंगे ये ही ज़िंदगी के इम्तेहाँ शायद

 

सहर जो गौर से देखे तो उसको भी नज़र आए

बुझी शम्मा के मुर्दा जिस्म से उठता धुआँ शायद






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