चंद पुराने ख़त...


Vikas Posted: February 03 ,2014

मेरे मेहमानख़ाने की पुरानी आलमारी में 

पीले पड़ चुके अख़बार की कुछ बासी ख़बरों पे

रखी हैं कुछ किताबें गर्द की एक परत में लिपटी

उन कुछ क़िताबों में मेरी एक डायरी भी है

कभी जिसमें लिखे थे ढेर सारे ख़त किसी के नाम

जो लिखे तो गये थे, पर कभी भेजे ना जा पाए

 

हाँ, याद है मुझको ये ख़त कॉलेज में लिखे थे

मेरे ब्लू कैप वाले फेवरेट रेनॉल्ड्स के पेन से

बहुत दिन हो गये बाज़ार में देखा नही वो पेन

आगे बढ़ चुके हैं शौक़ लिखने वालों के शायद

 

अक्सर आज भी मैं आज से ले कर ज़रा वक़्त

पहुँच जाता हूँ गुज़रे वक़्त से मिलने की ख़ातिर, और

उठा लेता हूँ अपनी डायरी को आलमारी से

हटा कर ज़िल्द पर से गर्द को पन्ने पलटता हूँ

और ख़त-दर-ख़त हर एक एहसास को महसूस करता हूँ

बयाँ करते हैं ख़त सारे अधूरी दास्ताँ कोई

अधूरेपन में जिसने पा लिया हो जीने का ज़रिया

 

ज़रा हल्का सा पड़ता जा रहा है रंग स्याही का

पीली पड़ रही है डायरी अख़बार की तरह

मगर ख़त में बसे वो पल अभी उतने ही ताज़े हैं

और वो डायरी यादों से अब भी महका करती है

 

मेरे मेहमानख़ाने की पुरानी आलमारी में

थोड़े और पीले पड़ चुके अख़बार के उपर

वो सब यादें मेरी एक डायरी में बंद रहती हैं...





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