तलाश


Vikas Posted: March 15 ,2014

जब तब ख़ुद को ख़ुद में ही उतर कर ढूँढता हूँ मैं
अपना अक्स आईने में अक्सर ढूँढता हूँ मैं


हूँ अपनी ख़्वाहिशों से बेख़बर कुछ इस तरह ख़ुद ही
कि साहिल पर खड़ा हो कर समंदर ढूँढता हूँ मैं


फ़राज़-ए-आसमाँ पर खोई थी मैंने कभी परवाज़
उसे फ़िर आज क्यों आख़िर ज़मीं पर ढूँढता हूँ मैं


खड़ा हूँ एक चौराहे पे जाऊँ तो कहाँ जाऊँ
लिए आशुफ्तगी, आवाज़-ए-रहबर ढूँढता हूँ मैं


शहर में बढ़ गयी है भीड़ आलीशाँ मकानों की
कहीं उस भीड़ में छोटा सा एक घर ढूँढता हूँ मैं


न जाने टूट कर चुभते रहे आँखों में कितने ख़्वाब
अब अपना एक, बस एक ख़्वाब-ए-पैकर ढूँढता हूँ मैं


किसी दिन गर्दिशें बदलेंगी तारों और सय्यारों की
इसी उम्मीद में अपना मुक़द्दर ढूँढता हूँ मैं





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