-- संस्मरण --


Payal Agarwal Posted: January 29 ,2014

अकस्मात ही कभी-कभी                     

स्थिर नीर में उठने लगते है कैसे बुलबुले 

अतीत के गर्भ से निकलने को व्याकुल 

कुछ बिसरी यादें 

और वही चिर-परिचित उत्कंठा

उस बड़े ही एहतियात से रखे   

एलबम में तिरने को   

             

कितना कुछ सिमटा उन चन्द पर्णों में 

एक                                  

पूरी की पूरी  ज़िन्दगी  

 

समय की गर्द में ढकी   

धूल-धूसरित तस्वीरें और धुंधली स्मृतियाँ 

 

झाँकता हुआ बचपन - किलकारी मारता 

नात-रिश्ते--मित्र -यार -छूटे हुए कई तार 

माँ-बाबा -सौम्य – दृढ़--उभरती हुई हल्की लक़ीरें    

कुछ बरगद से ठोस बुनियाद -नींव -आधार 

मेरे इस आज का 

गर्व से थामे मुझे औ कुटुंब के और भी कई

पल्लवित होते कोंपल को    

 

आहा किन्तु ...

डबडबाता हुआ मन अब भी  कहाँ भरा था 

नज़रें कुछ ढूंढ ही तो रही थी 

हमेशा की तरह उस आखरी  

फलक तक हुँचने की वही व्याकुलता

जो समेटे था लम्हा 

जुड़ते हुआ एक संयोग का....!

 

बस यही अन्तिम था .

उसके बाद का  -- बिछोह अलगाव पीर 

ये सब तो आंतरिक होता है –तस्वीरें कहाँ दर्शा पाती है ये सब       

 

जख्म तो भर ही जाते है  

बस कुछ निशाँ उनकें होने का एहसास देते हैं हरदम  

 

जिन्हें कुँदेरने का मन होता है ऐसे ही कई बार 

 

 कहाँ विस्मृत होती है ये जहन में दबी हुई कुछ यादें .... !   

  

~पायल~

 

 





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