इंतज़ार


Vikas Posted: February 06 ,2014

ढूंढ़ने चले जो निशाँ शाख़सार के

टुकड़े जगह जगह मिले पिछली बहार के

 

जाने सफ़र-ए-ज़िंदगी कितना दराज़ है

उकता गये हम एक शब-ए-फुरक़त गुज़ार के

 

होने लगा है अब तो हक़ीक़त पे भी शुबा 

आख़िर कहाँ गये वो दौर ऐतबार के

 

चुपके से आज रख दिया दिल ने कहे बग़ैर

पलकों पे एक गुज़रा ज़माना उतार के

 

अरसा गुज़र गया तुम्हे रुख़सत किये हुए

सब कुछ बदल गया...सिवाय इंतज़ार के





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