ज़ुबानी


Vikas Posted: May 22 ,2014

आग सी अपने जिस्म-ओ-दिल में लगाई मैंने
अपने हाथों से तेरी चिट्ठी जलाई मैंने

ख़ाक हर लफ़्ज़ की उड़ उड़ के गिरी आँखें में
हर्फ़-दर-हर्फ़ खोई अपनी बीनाई मैंने 

तुमसे मिलना यूँ मेरे सच को गवारा तो न था
बड़ी मुश्किल से हक़ीक़त ये चुराई मैंने 

तुमने देखा तो होगा हश्र-ए-शमाँ हर सुबह
बस, मोहब्बत कुछ इस तरह ही निभाई मैंने

ख़ूब करते थे मुझसे पुर्सिश-ए-असबाब-ए-अलम
सिसक उठे वो जो फ़ेहरिस्त बताई मैंने

मुझसे अब और दलीलें न माँग ऐ दुनिया
जितनी बस में थी मेरे दे दी सफाई मैंने 

हो गया मयक़दे में रिन्दों की नफ़रत का शिकार
ला'इल्म एक बूँद-ए-मय जो गिराई मैंने

बे-इरादा हुआ बेबाक जो पल भर के लिए
ख़ामख़ा ले ली जहाँ भर की बुराई मैंने

किसे इल्ज़ाम दूँ बेगानगी का मैं, और क्यूँ
ज़िंदगी अपनी ही कर ली है पराई मैंने

मुझे इंसानों के दुनिया में बनानी है जगह
बस यही सोच के छोड़ी है खुदाई मैंने

धड़कनें दिल से मेरे लम्हा लम्हा जाती रही
अपनी हर साँस क़तरा क़तरा गँवाई मैंने

मुझे इस दुनिया के चेहरे से गिला था थोड़ा
सो अपनी एक अलग दुनिया बनाई मैंने

बड़ा कमज़ोर बनायें ये तकल्लुफ़ ये रिवाज
बड़ा खुश हूँ की पाई इनसे रिहाई मैंने

सुकून खो के अपना शक्ल-ए-नेकदिल पाई
हाँ ये क़ीमत ज़रा ज़्यादा ही चुकाई मैंने

मेरा साहिल से कभी ख़ुशनुमा नाता न रहा
बारहा कश्ती समंदर में डुबाई मैंने

तुम मेरी दास्ताँ से इत्तेफ़ाक़ रखते हो
सोच कर बस ये तुम्हें अपनी सुनाई मैंने

 





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