धूप की छाँव में


Meena Sood Posted: September 24 ,2014

कभी कभी बरसते हैं बादल मेरे भी गाँव में 
धूप छुपकर रह जाती है.…..........………

छुप जाती है वो बादलों के गहरे आँचल में 
ढक लेती है उसे बादलों की छाँव………

धूप फिर कोशिश करती है छनकर आने की 
अपनी सुनहरी आभा बिखेरने को ..............
 
पर बादलों की छाँव इतनी भाती है उसे 

कि हार जाती है वो खुश होकर ..
रह जाती है बादलों की ओट में 

और फिर जन्म लेती है एक कविता 
कविता प्रेम की....................

प्रेम के मायने ही यही कि 
बस ख़ुद को खो दिया जाए.................

जानती है वो कि बादलों की एक बूँद में भी 
प्रेम की सहस्त्रों कवितायें हैं.…………… 
जानती है वो ....……………………....





Related Stories

Designed By: Web Solution Centre